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सरदार पटेल की 5 सबसे बड़ी चुनौती बने थे ये राज्य। India after independence | Partition 1947

18 May, 2024

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इक परी पैकर के कानो के लिये। हमने फड़ बाज़ार से झुमके लिये। उसे मिलने के लिये जनपथ गये। आधे घंटे तक वहां बैठे रहे। फिर वो आई अपनी महंगी कार से। रौशनी उठने लगी बाज़ार से। ड्राइवर ने गेट खोला कार का। रंग फींका पड़ गया बाज़ार का। दूधिया चेहरे प फैली रौशनी। देख मुझको और रौशन हो गई। नीली टॉप और ग्रे कलर की ट्राउज़र। हाथ में लेदर के क्लच को थाम कर। आहनी बुत की तरफ़ इक मरमरी। मेरी जानिब आ रही है इक परी। लफ़्ज़ गूंगे हैं क़लम नाकाम है। ये ख़ुदा का सबसे बेहतर काम है। भारी भरकम छातियों का तनतनाव। उसके कूल्हों का उठान और ये घुमाव। उनके बीच इक शोख़ पतली सी कमर। दो पहाड़ी जोड़ती इक रहगुज़र। उसकी गरदन का बयाँ दुशवार है। जैसे पीतल का कोई शाहकार है। बाज़ू देखे दर खुला इमकान का। हमने अंदाज़ा लगाया रान का। पाँव में हैं कोल्हापुर की जूतियाँ। जैसे मोती से भरी हों सीपियाँ। कूल्हों से नीचे लटकते लम्बे बाल। ख़म अगर होते तो नागन की मिसाल। मेरे पास आ कर गले से लग गई। कायनाती मसअलों का हल हुई। "हाइ सरमद! जानेमन कैसे हैं आप?" "ठीक हूं, अच्छा हूं मैं, और कहिये आप।" चलिये चल कर चाय पीते हैं कहीं। मैंने बोला "हां वो! जी वो! जी नहीं।" यां प कोई कॉफ़ी कैफ़े डे नहीं। और दुकानों के भी हाल अच्छे नहीं। हंस के बोली चलिये उठिये जानेमन। आज है जनपथ की चा पीने का मन। फिर वो नाज़ अंदाज़ की पाली हुई। एक दहकां ज़ादे के हमराह थी। कार से नीचे न धरती थी जो पाँव। वो भरे बाज़ार में पैदल चली। रंग में डूबे हुये बाज़ार में। मैं भी था उस शोख़ की रफ़तार में। उसने उंगली के इशारे से कहा। "देखिये वो कुर्ता काले रंग का।" "मुझको वो लेना है दिलवा दीजिये। ज़िद है महबूबा की पूरी कीजिये।" तीन सौ रुपये का कुर्ता ले लिया। ऐसे ख़ुश थी जाने क्या क्या ले लिया। इक दुकाँ पर बैठ कर के चाय पी। दुनिया भर के मसअलों पर बात की। बात क्या वो सुन रही थी बस मुझे। झाड़ता था मैं जहाँ के फ़लसफ़े। बोलता था मैं वुजूद और ज़ात पर। उसने रक्खा हाथ मेरे हाथ पर। और मेरे होठों को चुप सी लग गई। ताक़ में रक्खी हुई थी फ़लसफ़ी। कांपते हाथों प हाथों का कसाव। जिस्म के दरिया में रूहों का बहाव। फिर वो बोली "लाइये झुमके मेरे।" संदली हाथों प झुमके रख दिये। सोने के बुंदे उतारे कान से। और वो झुमके उसने पहने शान से। चार सौ रुपये के झुमकों पर फ़िदा। हाय वो उसके चहकने की अदा। "कैसी लगती हूं ज़रा कुछ बोलिये। चलिये मेरी एक फ़ोटो लीजिये।" एक घंटे तक वो मेरे साथ थी। दिल की दुनिया इश्क़ का बाज़ार थी। अब उसे जाना है अपने घर मियाँ। और मैं डालूंगा यहीं बिस्तर मियाँ। मैं यहां बैठूंगा और उसके बग़ैर। उसके होने के गुमाँ में थोड़ी देर। मैंने इक ऑटो रुकाया हाथ से। हाथ छुड़वा लेगी अब वो हाथ से। जाते वक़्त उसके गले से लग गये। उसके माथे के कई बोसे लिये। "फिर मिलेंगे" कह के मुझसे चल पड़ी। ख़्वाब से आई थी रुख़सत हो गई। और मेरे हाथ में थी एक नज़्म। नज़्म क्या महकी हुई सी एक बज़्म। इक परी पैकर के कानो के लिये। हमने फड़ बाज़ार से झुमके लिये। Naeem Sarmad #historyconnect

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